|| छत्रपति ||

इन्द्र जिमि जंभपर , वाडव सुअंभपर |
रावन सदंभपर , रघुकुल राज है ||

पौन बरिबाहपर , संभु रतिनाहपर |
ज्यो सहसबाहपर , राम द्विजराज है ||

दावा द्रुमदंडपर , चीता मृगझुंडपर |
भूषण वितुण्डपर , जैसे मृगराज है ||

तेजतम अंसपर , कन्हजिमि कंसपर |
तो म्लेंच्छ बंसपर , शेर सिवराज है ||

साजि चतुरंग बीररंगमें तुरंग चढी ,
सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत है |
भूषन भनत नाद बिहद नगारन के ,
नदी नद मद गैबरनके रलत है ||
भूपन भनत भाग्यो कासीपति विश्वनाथ ,
और कौन गिनतीमें भूली गति भब की |
चारों वर्ण धर्म छोडि कलमा निवाज पढ़ी ,
सिवाजी न होतो तो सुनति होत सब की ||

चकित चकत चौकी चौकी उठे बार बार
दिल्ली दहसती चित चाहे खरकती है |
बिलखी बदन बिलखात बिजैपुर पति
फिरत फिरंगन की नारी फरकती है |
थरथर कापत कुतुब्शह गोलकुंडा
…हहरी हवस भूप भीर भरकती है |
राजा शिवराज के नगारन की धाक सुनी
केते पात साहन की छाती थरकती है ||

– कवी भूषण

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